जिंदगी
जाने क्या धुन सी लगी है
बस दौड़ते जा रहे हैं
मंज़िल कोई नहीं है मगर
राहों पर फिसलते जा रहे हैं
ठहरना अब शायद मुमकिन नहीं
एहसास सारे खोते जा रहे हैं
अकेले गुमराह भटकते हैं सभी
साथ रहने से गुरेज़ किये जा रहे हैं
मरने की किसी को ज़रूरत नहीं
जीते जीते ही रोज़ मरते जा रहें हैं।
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