सब पराए थे..
जितने अपने थे , सब पराए थे ,
हम हवा को गले लगाए थे...
जितनी कसमें थी , सब थी शर्मिंदा ,
जितने वादे थे सर झुकाए थे ,
जितने आंसू थे सब थे बेगाने..२
जितने मेहमान थे बिन बुलाए थे ।
सब किताबे पढ़ी-पढ़ाई थी ,
सारे किस्से सुने-सुनाए थे ,
एक बंजर जमीं के सीने में..२
मैंने कुछ आसमां उगाए थे ।
सिर्फ दो घूंट प्यास कि खातिर ,
उम्र भर धूप में नहाए थे ,
हाशिए पर खड़े हुए है हम..२
हमने खुद हाशिए बनाए थे ।
@Deep...✍️
Comments
Post a Comment